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त्योहार और अनुष्ठान · 21 अक्टूबर 2026 · 8 मिनट में पढ़ें

लक्ष्मी पूजा 2026: दिवाली की मुख्य रात का महत्व और परिवार इसे कैसे मनाते हैं

लक्ष्मी पूजा 2026 रविवार, 8 नवंबर की शाम को है। लक्ष्मी, गणेश और कुबेर की पूजा साथ क्यों होती है, घर पर यह शाम आमतौर पर कैसे बीतती है, दरवाज़े खुले क्यों रखे जाते हैं, और उत्तर व उत्तर-पूर्व का क्या महत्व है।

लेखिका: , वास्तु सलाहकार, अंधेरी ईस्ट, मुंबई

लक्ष्मी पूजा 2026: दिवाली की मुख्य रात का महत्व और परिवार इसे कैसे मनाते हैं

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2026 में लक्ष्मी पूजा कब है?

ज़्यादातर पंचांगों के अनुसार 2026 में लक्ष्मी पूजा रविवार, 8 नवंबर की शाम को है। यह अमावस्या की रात है। मराठी और गुजराती कैलेंडर में इसी अमावस्या के साथ आश्विन का महीना पूरा होता है, जबकि उत्तर भारत के कैलेंडर में यह कार्तिक महीने में पड़ती है। पाँच दिन के त्योहार का यह मुख्य दिन है, जो 7 नवंबर की नरक चतुर्दशी के बाद आता है।

पूजा सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में की जाती है, और कई परिवार इसी के भीतर का एक छोटा मुहूर्त मानते हैं। यह समय हर शहर में अलग होता है, इसलिए मुंबई का, या आप जहाँ भी हों वहाँ का, सही समय किसी फ़ॉरवर्ड किए गए मैसेज से नहीं, पंचांग या अपने पारिवारिक पंडित जी से पक्का करें। पाँचों दिनों की पूरी योजना हमारे दिवाली 2026 वास्तु कैलेंडर में है।

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लक्ष्मी पूजा दिवाली की मुख्य रात क्यों है?

यह दिवाली की मुख्य रात इसलिए है कि इसी रात, महीने की सबसे अँधेरी रात में, घर-परिवार विधि-विधान से लक्ष्मी जी का स्वागत करता है, जो समृद्धि और खुशहाली की देवी हैं। त्योहार में जलने वाला हर दीया इसी रात की तैयारी है। बिना चाँद की रात में जगमगाती रोशनी, दिवाली का अर्थ समझाने वाली सबसे सीधी तस्वीर है।

कई परंपराएँ लक्ष्मी जी को समुद्र मंथन से जोड़ती हैं; माना जाता है कि वे उसी से प्रकट हुई थीं। दिवाली श्रीराम के अयोध्या लौटने की भी याद दिलाती है, जब दीयों की कतारें सजाकर उनका स्वागत हुआ था। ये सारी कथाएँ एक ही बात पर आकर मिलती हैं: साफ़-सुथरा, रोशन और खुला घर, जो हर अच्छी चीज़ के स्वागत के लिए तैयार हो।

यह याद रखना अच्छा है कि लक्ष्मी का अर्थ सिर्फ़ पैसा नहीं है। ज़्यादातर परिवार जिस तरह उनकी बात करते हैं, उसमें वे सेहत भी हैं, आपसी मेल भी, रसोई में अन्न भी और घर के लोगों के बीच शांति भी। इसीलिए तैयारी सिर्फ़ लॉकर की नहीं, पूरे घर की होती है।

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लक्ष्मी, गणेश और कुबेर की पूजा साथ क्यों होती है?

इनकी पूजा साथ इसलिए होती है कि तीनों एक-दूसरे को पूरा करते हैं: गणेश जी रास्ते की रुकावटें दूर करते हैं और बुद्धि देते हैं, लक्ष्मी जी समृद्धि देती हैं, और कुबेर उसकी रक्षा करके उसे सँभाले रखते हैं। समझदारी न हो, या धन को सँभालने की कोई पक्की जगह न हो, तो समृद्धि ज़्यादा दिन नहीं टिकती।

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    गणेश जी, हमेशा सबसे पहले

    गणेश जी विघ्नहर्ता हैं, इसलिए लगभग हर हिंदू पूजा-विधि में सबसे पहले उन्हीं की पूजा होती है। दिवाली पर वे बुद्धि के भी प्रतीक हैं, यानी धन का सही उपयोग करने की समझ। उनकी मूर्ति या तस्वीर लक्ष्मी जी के बगल में रखी जाती है, उसी तरफ़ जिधर आपके परिवार की परंपरा है।

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    लक्ष्मी जी, जिनके लिए यह शाम है

    लक्ष्मी जी से प्रार्थना पूरे परिवार की बरकत और मंगल के लिए की जाती है, किसी एक व्यक्ति की किस्मत के लिए नहीं।

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    कुबेर, धन के रखवाले

    कुबेर देवताओं के कोषाध्यक्ष हैं और वास्तु में उत्तर दिशा के रक्षक। कुछ परिवार उनकी मूर्ति या कुबेर यंत्र की पूजा करते हैं; बहुत-से परिवार बस वे सिक्के, गहने या कैश बॉक्स देवताओं के सामने रख देते हैं, जिन्हें कुबेर का प्रतीक माना जाता है।

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    कुछ घरों में सरस्वती जी भी

    व्यापारी परिवार अक्सर उसी शाम नए बही-खातों की पूजा करते हैं, ताकि धन के साथ ज्ञान का भी सम्मान हो; चोपड़ा पूजन के पीछे यही भाव है।

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घर पर लक्ष्मी पूजा की शाम परिवार कैसे मनाते हैं?

ज़्यादातर परिवार मोटे तौर पर एक ही क्रम अपनाते हैं: दिन में घर तैयार करना, शाम ढलते ही प्रवेश पर दीये जलाना, पहले गणेश जी और फिर लक्ष्मी जी व कुबेर की पूजा करना, सबका मिलकर आरती करना, और फिर रोशनी को पूरे घर में ले जाना। बारीकियाँ समुदाय और इलाके के हिसाब से बदलती हैं, इसलिए जहाँ आपके बड़ों या पंडित जी का तरीका इससे अलग हो, वहाँ उन्हीं की बात मानें।

किस ओर मुँह करके बैठें और कौन-सा दीया कहाँ रखें, यह हमारी गाइड लक्ष्मी पूजा की दिशा और दीये कहाँ रखें में बताया गया है, इसलिए उसे यहाँ दोहराया नहीं गया है।

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    दिन में

    स्नान, साफ़ कपड़े, और प्रवेश व घर के केंद्र में आखिरी बार झाड़ू। कई महाराष्ट्रीय घरों में नई झाड़ू खरीदी जाती है और उस शाम लक्ष्मी का रूप मानकर उसकी पूजा होती है; यह याद दिलाता है कि साफ़-सफ़ाई भी स्वागत का हिस्सा है।

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    शाम ढलते ही

    सबसे पहले प्रवेश: तोरण ठीक से लगा है, यह देख लें, रंगोली पूरी कर लें, और कुछ भी और करने से पहले दरवाज़े के दीये जला दें।

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    पूजा की तैयारी

    चौकी, कलश, मूर्तियाँ या तस्वीरें और पूजा सामग्री: फूल, कुमकुम, हल्दी, चावल, मिठाई, खील (मराठी में लाह्या), बताशे, साबुत धनिया और गुड़, साथ में देवताओं के सामने रखे सिक्के या गहने।

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    पहले गणेश जी, फिर लक्ष्मी जी और कुबेर

    पहले छोटा-सा संकल्प, जिसमें बोलकर बताया जाता है कि पूजा किस उद्देश्य से की जा रही है; फिर गणेश जी की पूजा, और उसके बाद लक्ष्मी जी व कुबेर की।

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    सब मिलकर आरती

    पूरा परिवार साथ आता है, बच्चे भी।

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    रोशनी को घर भर में ले जाना

    बाकी दीये पूजा की जगह से शुरू करके बाहर की ओर जलाए जाते हैं, प्रसाद बाँटा जाता है, और परिवार साथ बैठकर खाना खाता है।

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दिवाली की रात दरवाज़े और खिड़कियाँ खुली क्यों रखी जाती हैं?

लक्ष्मी पूजा की रात दरवाज़े और खिड़कियाँ इसलिए खुली रखी जाती हैं क्योंकि परंपरा में माना जाता है कि लक्ष्मी जी उन घरों में आती हैं जो रोशन हों और स्वागत के लिए तैयार हों; बंद और अँधेरा घर तो न्योते का बिल्कुल उल्टा है। वास्तु में मुख्य द्वार घर का मुख है, जिससे प्राण (जीवन-ऊर्जा) भीतर आता है, और खुला, उजला प्रवेश ठीक यही भाव दिखाता है।

मुंबई के फ़्लैट में इसे समझदारी से अपनाएँ। पूजा के समय और जब तक परिवार साथ बैठा हो, मुख्य द्वार खुला या थोड़ा-सा खुला रखें; सेफ़्टी ग्रिल हो तो उसकी कुंडी लगी रहे; और जब सब सोने जाएँ, तो दरवाज़ा बंद कर दें। ताज़ी हवा के लिए उत्तर और पूर्व की खिड़कियाँ खोलें, खासकर जब बहुत-से दीये और धूपबत्ती जल रही हों, और बाहर पटाखों का धुआँ ज़्यादा हो तो उन्हें बंद कर दें।

शाम भर प्रवेश पर एक दीया जलता रहने दें, पर सिर्फ़ तब तक, जब तक कोई जागकर उस पर नज़र रख रहा हो। परंपरा रोशनी और स्वागत की बात करती है, पर्दे या बच्चे के पास बिना निगरानी जलती लौ की नहीं।

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लक्ष्मी पूजा की रात उत्तर और उत्तर-पूर्व क्यों अहम हैं?

ये दोनों दिशाएँ इसलिए अहम हैं कि उत्तर कुबेर की दिशा है, जिसे धन और नए अवसरों से जोड़ा जाता है, और ईशान्य, यानी उत्तर-पूर्व, ईश और जल तत्व का ज़ोन है, घर का सबसे पवित्र कोना। लक्ष्मी पूजा दोनों से जुड़ी है, इसीलिए चौकी आमतौर पर उत्तर-पूर्व में लगती है और परिवार उत्तर या पूर्व की ओर मुँह करके बैठता है।

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    दोनों ज़ोन खाली रखें

    त्योहार की शॉपिंग के थैले, गिफ़्ट हैम्पर, जूते-चप्पल और डिब्बों के ढेर अक्सर ठीक इन्हीं कोनों में जमा हो जाते हैं। इस शाम के लिए इन्हें दक्षिण या पश्चिम में खिसका दें।

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    उत्तर-पूर्व में जल

    चौकी पर या उसके पास रखा पानी से भरा कलश, जिसके मुँह पर पत्ते और नारियल रखा हो, उत्तर-पूर्व में जल तत्व लाता है।

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    लॉकर और उत्तर दिशा

    अगर पूजा के लिए कैश बॉक्स या लॉकर खोला जाता है, तो परंपरा के अनुसार वह दक्षिण या दक्षिण-पश्चिम की दीवार से सटा होता है और उत्तर की ओर खुलता है। ऐसा क्यों, यह हमारे लेख कुबेर और उत्तर दिशा में बताया गया है।

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    अगर उत्तर-पूर्व काम में न आ सके

    अगर उस कोने में टॉयलेट, रसोई या यूटिलिटी एरिया है, तो उत्तर या पूर्व में अगली साफ़ जगह चुनें। हर लेआउट में कोई न कोई रास्ता निकल आता है, और सटीक नाप-जोख से ज़्यादा श्रद्धा मायने रखती है।

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लक्ष्मी पूजा के अगले दिन सुबह क्या करें?

लक्ष्मी पूजा के अगले दिन सुबह जल चुके दीये और मुरझाए फूल हटा दें, बचा हुआ प्रसाद बाँट दें, और चौकी को हड़बड़ी में न समेटें, उसे साफ़-सुथरी सजी रहने दें। कुछ घरों में मूर्तियाँ कुछ दिन अपनी जगह पर ही रहती हैं; आप अपने परिवार की रीति के अनुसार चलें।

फिर अगले त्योहार की तैयारी करें: गोवर्धन पूजा और दिवाली पाडवा। इस साल पंचांगों में एक दिन का फ़र्क है: कुछ सोमवार, 9 नवंबर बता रहे हैं और कुछ मंगलवार, 10 नवंबर, इसलिए अन्नकूट के भोजन या पाडवा की आरती की योजना बनाने से पहले अपना कैलेंडर देख लें।

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वास्तु विशेषज्ञ से कब सलाह लें?

अगर हर दिवाली आपको एक ही समस्या दिखाती है, तो वास्तु विशेषज्ञ से सलाह लें: पूजा का ऐसा कोना जो कभी ठीक से जमा हुआ न लगे, ऐसा उत्तर-पूर्व जिसमें टॉयलेट या स्टोररूम बना हो, या ऐसा प्रवेश जो कितनी भी रोशनी कर लें, अँधेरा ही रहे। ये लेआउट के सवाल हैं, और आमतौर पर बिना कोई दीवार तोड़े सुलझ जाते हैं।

VastuKimaya की डॉ. किमया पारिख-आंबेकर अंधेरी ईस्ट के ऑफ़िस से, पूरे मुंबई में साइट विज़िट करके, और आपके फ़्लोर प्लान व तस्वीरों के ज़रिए दूर से भी घरों के लिए परामर्श देती हैं। उपाय बिना तोड़-फोड़ वाले होते हैं, इसलिए किराए के फ़्लैट में भी काम आते हैं। वास्तु घर को ज़्यादा शांत और व्यवस्थित बनाने में सहायक है; यह धन का वादा नहीं है, और आपकी अपनी मेहनत और समझदारी के साथ-साथ ही चलता है।

सवाल

आम सवाल

2026 में लक्ष्मी पूजा कब है?

ज़्यादातर पंचांगों के अनुसार लक्ष्मी पूजा रविवार, 8 नवंबर 2026 की शाम को, सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में है। अपने शहर का सही मुहूर्त पंचांग या अपने पारिवारिक पंडित जी से पक्का कर लें।

दिवाली पर लक्ष्मी जी से पहले गणेश जी की पूजा क्यों होती है?

गणेश जी विघ्नहर्ता हैं, इसलिए ज़्यादातर हिंदू पूजा-विधियों में सबसे पहले उन्हीं की पूजा होती है। दिवाली पर वे बुद्धि के भी प्रतीक हैं, यानी समृद्धि का सही उपयोग करने की समझ; इसीलिए उन्हें लक्ष्मी जी के बगल में रखा जाता है।

दिवाली पर कुबेर की पूजा क्यों होती है?

कुबेर देवताओं के कोषाध्यक्ष और उत्तर दिशा के रक्षक हैं। लक्ष्मी जी के साथ उनकी पूजा इसलिए होती है कि वे धन की रक्षा करते हैं और उसे सँभालकर रखते हैं। उनका प्रतीक अक्सर सिक्के, गहने या घर का कैश बॉक्स होता है।

क्या दिवाली की रात मुख्य द्वार खुला रखना चाहिए?

परंपरा के अनुसार, हाँ। लक्ष्मी जी के स्वागत के लिए पूजा के समय और जब तक परिवार साथ बैठा हो, मुख्य द्वार खुला या थोड़ा-सा खुला रखें, और जब सब सोने जाएँ तो बंद कर दें। जलते दीयों को कभी बिना निगरानी के न छोड़ें।

क्या लक्ष्मी पूजा बिना पंडित जी के घर पर की जा सकती है?

हाँ। कई परिवार किसी बड़े के मार्गदर्शन में या पूजा की किसी सरल किताब की मदद से खुद ही पूजा करते हैं: पहले गणेश जी, फिर लक्ष्मी जी और कुबेर, उसके बाद आरती, और फिर पूरे घर में दीये जलाना।

दिवाली पर लक्ष्मी जी को क्या चढ़ाया जाता है?

आमतौर पर फूल, कुमकुम, हल्दी, चावल, मिठाई, खील, बताशे, साबुत धनिया और गुड़ चढ़ाए जाते हैं, और उनके सामने सिक्के या गहने रखे जाते हैं। चढ़ावा परिवार और इलाके के हिसाब से अलग-अलग होता है।

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